सुनोतो !!

कुछतो कह्नेका मन हैं ।  राजनितिपे रोनेका मन है।  हमभी देशवासी है। देशके लिये कुछ करेनेका हक्क है। जो चल रहाहै देशमें देख नही पाते हैं । मन मचलताहें जब सो नही पाते हैं ।
कोने कोनेसे खबरोंकी बहार आती है ं ईन्सान शर्मसे जुक जाऍ ऐसी बात आती है।
हम सुनतें रहतें है, समाचर पत्रके पन्नोसे हमे घीन्न आती हैं
आदमी बदल गया हैं, कहताहै जमाना बदल गया है।

कुछ करनेवाले लोग है जरुर मगर कुछ भी नही कर पातेहै।
अहंकारका अडंगा लगा देते हैं।और कहते है हमे देशकी फिक्र है।
चौक जाओ जनता ,आपको हमारी बिनति है।
आजादीके बाद भी गुलामी की ही बारी है।

समझजाओ सुधरजाओ अपना हित पहचानो दोस्तो ।
अपनी आखोंसे दुनिया देखो ,अपने दिलसे देशको समजो ।
राजनिति के दंगलमें बह न जाओ ,अपना किनारा आपही ढूण्ढो।
बात हमारी समजन आये तो माफ करो पर अपने अंदर गोर करो \
जयहिन्द ।

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जीवनके रंग

जीवनके विविध रंग है। रंगोको किस प्रकारसे हम जीवन में भरते है वह मह्तव्पूर्ण है। अकसर हम दूसरोके चित्र के रंगोको देखते है और गलतियां कर जाते है। परीणाम स्वरुप हम अपने चित्रको देखना ही छोड देते है । दूसरोके रंगोसेअपने जीवनका ग्राफ बनाते है। अपने में विस्वास रहेगा तो जीन्दगी सही तरह से जी सकेंगे ,अन्यथा जीवन बेकार है।

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नया साल मुबारक !!!

किसी व्यक्ति को आप अच्छा या बुरा तभी कह शकते हो ,जब आप अच्छे बुरे को पहचानते हो । सही में कोई व्यक्ति कायम अच्छा भी नहीं होता और कायम बुरा भी नही होता ।कोई हमारे लिये बुरा हो मगर दूसरे के लिये वह अच्छा हो शकता है । इस प्रकार कोई हमारे लिये अच्छा हो वह दूसरोके लिये बुरा भी हो शकता है । सभी को इन्सान समजेंगे तो सबसे सही हैं ।फल स्वरुप काफी परेशानी हल हो शक्ती हैं । अपने मनकी ग्रंथिओ से मुकत हो गये तो काफी शांति मिलनेका अवसर पा शक्ते हैं । इस समय  सबको आवश्यकता हैं । बदलाव की जरुरत अपने अंदर है। अपने अभिप्राय को बदलेगा तो व्यक्ति के प्रति जो भाव आते जाते रहते है फर्क महसूस कर शकते है। अपने विचार,अपने अभिप्राय के कारण हम व्यक्ति को कायम दोषित समजते है। वास्तवमें व्यक्ति आप कीसोच से बिलकुल अलग भी साबित हो शकता है। परिस्थिति वश इन्सान अपने को सही साबित नहीं कर शकता । इसमें व्यक्ति का कोई दोष नही हैं ,उनका समय खराब होने के कारण उनसे गलतियां हो जाती है , तब नुकशान कर देता है। इसका मतलब यह नही की आदमी कायम बुरा हैं । जरा सोचें क्यां आप कायम सही रहे हो? नहीं कहीं न कहीं हम बुरे हो ही जाते हैं  ,जीस प्रकार हम बुरे हो शक्ते है तो औरो का भी यही हाल है । सभी लोग की यही कहानी हैं । तो क्यों किसिको अच्छा बुरा समजे ? सब अपनी ही करनीका फल भुगत रहे हैं । चाहे अच्छा चाहे बुरा । कीसिको अ्च्छा बुरा साबित करने वाले हम कौन होते हैं ? हमें अपना ही नही पता की हम कब अच्छे होन्गे कब बुरे तो दूसरो को लेबल लगाने का अधिकार क्यों लेना ।

इसलिये नये सालमें कीसि को कुछ भी न कहने की कसम खओगे तो २०१२ अच्छा जायेगा। नये साल में कुछ तो सोचना चाहिये ।

सभी दोस्तोको नया साल मुबारक ।

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परिग्रह

इन्सान बचपन से लेकर बुढापा आने तक परिग्रह करता ही रहतां हैं । बचपनमें जितने खिल्लोने मिलते हैं बहुत ही कम से खेलता है, बाकी पडे रहते हैं ,फिर नये आते हैं । बचपनसे ही परिग्रहकी शुरूआत होती हैं । जवानीमें कीतने कपडे इक्क्ठा करते  हैं  हैं खुद को पता नही होता। पूरी जिन्दगी सामान  बटोरता रहता हैं । भारतीय समाजकोआदत पड चूकी हैं सामान जमा करनेकी।हर घरमें जाकर देखे तो ८०% सामान मात्र अलमारीके लिये होता हैं । कुछ सामान मात्र एक जनरेशन से दूसरी जनरेशनको मात्र देनेके लिए होता हैं । जरा सोचे हम ऐसा करने पर मजबूर क्यों हैं ।जो सामान हम पूरी जीन्दगी उपयोग नही करते उसे जमा क्यों करते हैं।कुछ सामान सलोसाल पडा रहता हैं,कुछ सामान मात्र कुछ लोगोके आने पर उपयोग में आता हैं । किमती सामान खरिदते रहते हैं पर उपयोग नही करते।कुछ सामान सिर्फ देखने के लिए रखते हैं। महेंगी चीजे खरीदते हैं कुछ विषेष लोगो के लिये जो जीवन में बहुत ही कम आते हैं । कुछ सामान ऐसा है जिसे वाकईमें फेकना होता है, पर हम उसेभी घर में सम्भाल के रखते हैं ,उेदाहरणके तौर पर नया टेलिविजन खरिदते हैं पूराना एक कोने में पडा रखते है ,बेचनेमें समय व्यतित करते हैं । कभी क्भी ऐसी चीजे सालो साल पडी रहती हैं ,पर भारतीय मन किसीको मुफ्तमें दे नही शकता । पूरानी चीजों से थोडी कमाई होगी करके संभालते हैं ।
अपने ही घरमें नजर दौडाए कितना सामान आप उपयोग में लाते हो ? हीसाब लगाईए कितना पौसा उनके पीछे लगता हैं । अगर पही पैसा आप भचाके रखते तो काफी काम आ शकता है। पूरी जीन्दगी ईकठ्ठा करने में बीतबी है। चाहे चिजे  हो ,चाहे प्रोपर्टी हो चाहे गहने हो या फालतू चीजो का अंबार।
साथमें कुछ नही आता । अगर कीसिको मुफ्तमें कुछ दीया हो तो लेने वाले के अंतर मन से जो दुवा निकलती है वही हमारे साथ जाती हैं। अंतमें हम चते जाते है, चिज वस्तुं रह जाती हैं । जो चिजे हमने अपने कमाई से खरीदी होती है, अपनी जान की तरह सालो साल संभालके रखी होती है हमारे जानेके बाद पीछे के लोग (अपने ही बच्चे) उसे आराम से फेक देते है। साथ मे कहते भी है कि पिताजीको कुछ समझ नही ,बेकारका सामान जमा करके हमारे लिये छोडा है।
अंत तक यह चीजे हमारा पिछा नही छोडती । समज लेना चाहीए जो चीज वस्तुं हमारे लिए कामकी हो नयी जनरेशन वालो के लिए बिलकुल व्यर्थ हो । आपने उन चीजो के खरीदने में इतना पैसा व्यय किया हो कि आप अपनी मर्जी से अपनी इच्छा पूर्तीभी नही कर पाये हो , सोचो इसके बदले आप हवाइजहाज की मुसाफरी कर शकते थे, कोइ फोरेन टूर का ख्वाबभी पूरा कर शकते थे, अपने आत्माके कल्याणके लिए यात्रा कर शक्ते थे, अपने आनंद के लिये जो चाहे कर शकते थे । पर आपने ऐसा नही किया । आपको मालूम नही आपकी अर्थी उठनेके बाद  आपके सामान को उठानेकी बारी है।

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स्वार्थ

अनेक लोग जिवनमें मिलते है , आप सभीको संतोष नही दे पाते। जो कोई भी आपको मिलता हैं चाहे आपके घर्के लोग हो यातो बाहरके लोग । हंमेशा एक प्रकारका व्यवहार आप नहीं कर पाते । संजोग और आपका मूड दोनो के बंधन में आप हो । फल स्वरूप आप किसीको सुखभी पहुचा शकते हो और दुःख भी दे शकते हों।सामने वालेके विचारधारा पर भी काफी कुछ निर्भर है। उनकी मर्जीके मुताबीक आप नही चलते हों तो भी उनको ठेस लगती हैं। आप कितना अच्छा सोचे सामने वाला आपके प्रति अभिप्राय से बंधा है तो वह आपके लिये गलत ही सोचेगा । दुनिया वाकई स्वार्थ से लिप्त है । लोग अपने स्वार्थ अनुसार कदम कदम पर रंग बदलते हैं। उनका गुनाह नही है । काल ही ऐसा है कि व्यक्ति छूट नही शकता।

छूटना चाहे तो भी कोई सही रास्ता दिखनेवाला नही मिलता ।कोई रस्ता दिखाए तो व्यकित को स्वीकार्य नही होता । समयके अनुसार वह चलता हैं । अपनी मनमानी नही होती तो सामने वालेको स्वार्थी ,निष्ठुर ,धमंडीका लेबल लगा देता हैं। पर वास्तवमें सभी लोग कोई न कोई स्वार्थमें जी रहे हैं । समय समय पर स्वार्थ् की परिभाषा बदलते रहते हैं ,फिर देखे तो सभी स्वार्थी हैं । और यही सत्य हैं. झूठ के परदे तले इन्सान यह बात मानता नही हैं ,पर है  सभी स्वर्थी ।अपना नुकसान उठाए और दुसरोको मद करे तो कुछ काम बने । मदद सभी करते हैं ,पर अपनी साइड सेफ रखके ,अपना नुकसान करके नही ।मदद करनेवाले हमेशा भ्रान्तीमें जीते हैं कि हम लोगोको बहोत मदद करते /करती हूं । पर सहीमैं ऐसा कुछ नही होता । मात्र दिखावा होता हैं ।अच्छे लोगोकी देश में कोई कमी नही हैं ,पर सभी अपने निजी स्वार्थके साथ ही चलते हैं । अपने स्वार्थको पहेचानो , टटोलो ,अपना मुखवटा उतर जायेगा तो सहीमें निःस्वार्थ बन पाओगे**********

यह मेरे मनकी बात हैं ,आप की भी हैं ******

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समय के अनुसार चलों ।

समय आज् बदल रहा हैं । रहन सहन और पहनावें में भारी बदलाव आ चूका है और आ रहा हैं ।धोती कुर्ता और पाजामा की जगह जीन्स पेन्ट आ चुके हैं । खानेमें चावल रोटीकी जगह बरगर आ चूके हैं ।पानी शरबत और छाछ के बदमे बियर की बोतलें चमक रही हैं । हर घरमें टेलिविजन की सुवीधा मौजुद हैं । लोग दुनियाकी कोई भी बात से अन्जान नही हैं । अमरीका के विझा इस्युं हो या सिरिया इजीप्तके देशकी समस्या, फूटबोल से लेके हेवी वेइट चेम्पयनशीप तक सभी जानकारी लोगोको हैं ।लोग समय अनुसार चलने लगे हैं। पर मात्र बाह्य आचरन से । खानपान परिवेष अवस्य बदला है पर अपनी सोच में कोई बदलाव नही हैं । बच्चे को अंग्रेजी माध्यमके स्कुलमें दाखिला दिलवाते हो ,फोरेन आगे अभ्यासके लिये भेजते हो , पर लडका या लडकी अपनी मरजी से शादीके लिये कहेंगे तो मना करोगे ,परिणाम स्वरुप कभी कभी बच्चें जानभी दे देते है । वह सब कबूल करोगें पर शादीके लिये हा नहीं करोगे । समाजके जातपात के उपर अपना डंडा जमाके रखोगे चाहे कोई भी किंमत चुकानी पडें । कभी कभी तो अपनी मरजी के मुताबीक लडकीकी पढाई भी रोक लेते हो। समाज सुधारकी कतारबंध फिल्में देखतें हों पर अपने घरके अंदर पुलिसकी तरह बर्ताव करतें हों ।अपने बेटो /बेटीको अपनी मरजी मानने के लिये बन्दुक का निशान जमाए बैठतें हों पर चोराहे पर फिल्मी लोगोके प्रेम प्रसंगको दोस्तों के साथ विस्तारसे चर्चा करतें हों ।
जरा सोचो वाकई आप समयके साथ बदले हैं ? विचारधारामें कोई बदलाव महसुस करते हैं क्यां ? बाहरकी दुनियाके जीस प्रकारसे तालमेल कर रहै हैं अपने घरमें वही व्यवहार निभा रहैं हैं ? आप तो शहरी लिबास में आ गये ,आपकी घरवाली अभी भी घुंघट ताने खडी हैं ?
वाकईमें आप बदले है ? मात्र समयतो नहीं बदला ? खुदकों टटोंले और पूछे कौन बदला हैं ? समय या आप ?अगर आप बदले हैं तो समयके अनुसार चलें , विचारोसे समयके साथ चलें , अपनी नई सोंचके साथ चलें ,आपके घरवाले आपका प्रतिबिंब हैं,उनसे पूछे सचमुच आप समयके साथ जा रहे हैं या समय से पिछे ? अपना इन्ट्रोस्पेक्षन खुद करे और सुधार लायें । जिन्दगी खुब सुरत हैं समयके साथ जी लो । समय निकल जायेगा फीर कीतनाभी पछताओगे वापस नही आयेगा ।********************

यह मेरे मनकी बात हैं ।मुझे आपके मनकी बातभी लगती हैं ।

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अभिप्राय

जीवनमें इन्सानको हर व्यक्ति विषेष से कुछ न कुछ अभिप्राय होते हैं । कुछ अच्छे कुछ बुरे। इन्ही अभिप्रायके माध्यमसे ,इन्सान हमे पसंद होता हैं ,और नापसंद होता हैं। अगर हम किसीके प्रति जो अभिप्राय बांधते हैं,वही हमारी गलती हैं ।किसीभी व्यक्ति विषेषके लिये हमे बिलकुल हक्क नही हैं की कुछ कहे, उनकी प्रक्रतिके हिसाबसे वह चलता हैं। जब हम अपने हिसाबसे उनको चलाना चाहते है ,तब अभिप्राय बंध जाते हैं । यह कभी भी मुमकीन नही की कोइ हमारी सोच से चले। आजकल संबंधोंमें ओ दरार आती हैं ,मुख्य कारण व्यक्ति आपनी इच्छाके मुताबिक सामने वालेसे वर्तन चाहता है। जो किसीके लिये स्वाभविक नही हैं। यह अभिप्राय इतने गाढ हो जाते हैं कि व्यक्ति उनके फल स्वरुप एक दूसरेके विरोधी हो जाते है,संबम्धोंमें खटाश का मुख्य कारण यही है। फलस्वरुप रिस्तोमें दरार आ जाती हैं। और हमारे देश में यही हो रहा हैं। समजने जैसी बात है । थोडी समज जीवनमें बहार ला शक्ती है।

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